पहेली | हिन्दी रहस्यमय भयकथा | Hindi Horror Story | लेखक – योगेश वसंत बोरसे

                        पहेली 

हिन्दी रहस्यमय भयकथा | Hindi Horror Story |

लेखक – योगेश वसंत बोरसे

 

सूचना :- यह कहानी पूरी तरह से काल्पनिक है और केवल मनोरंजन ही इसका एकमेव उद्देश है ! 

 TV पर Ad देखता था की दीवारों को फंगस लगती है , दिमख खा जाती है ,तो हसी आती थी ! तो लगता था ये लोग अपना प्रोडक्ट बेचने के लिए कुछ भी दिखाते है ! 

  लेकिन अब सामने जो दीवारे थी उन्हें देख कर हालत पतली हो रही थी। .. बरसो से बंद पड़े उस विरान मकान में इंसानो के सिवा शायद हर कोई रहता था ! कीड़े मकोड़े ,जिव जंतु , छिपकलीया ,मकड़ीया ,और न जाने क्या क्या !

  दिवार पर नजर जाती तो अलग अलग आकृतिया नजर आती थी ऐसा लगता था मानो अभी जिन्दा हो जाएगी ! और मुझ पर टूट पड़ेगी ! वहाँ  से निकलने की सोच ही रहा था की सामने की खिड़की खुली ! 

   शाम का वक़्त था। सूर्यदेवता अपने घर की ओर प्रस्थान कर रहे थे। … सूरज की कुछ किरणे उस कमरे में उस घर में आ रही थी तो थोड़ी बेचैनी कम हुई।  लेकिन जिसने खिड़की खोली उसका चेहरा नजर नहीं आ रहा था। क्यों की पीछे से सूरज की किरणे आ रही थी।

 शायद  औरत थी या लड़की ! लड़की ही होगी ! मैंने पुछा ,

“कौन है ?”

” नए हो ?” 

सामने से आवाज आयी ! 

“हां ! लेकिन आप कौन है ? “

” क्या फरक पड़ता है ? 

” अरे ? ऐसे कैसे ? मुझे पूछ रही हो तो खुद के बारे में भी बताओ ! “

” मै साधना ! “

“मै राजन ! …ये मेरे पुरखो का मकान है।  विरासत में मिला है मुझे। दो तीन साल हो गए ,लेकिन यहाँ आने का मौका नहीं मिला ,या यु कहो की आना नहीं हुआ।  लेकिन दो तीन दिनों से न जाने क्यों यहाँ आने का मन कर रहा था। तो आज आ गया।  तुम कौन हो ? “

  ” अभी तो बताया ? साधना ! “

” अरे वो तो ठीक है।  लेकिन कहाँ रहती हो ? क्या करती हो ? “

” क्या करुँगी ? रात भर घूमती रहती हूँ ! “

” क्यों ? घर पर कोई डाटता नहीं ? “

” कौन डाँटेगा ? कोई होना भी चाहिए ..! “

 ” क्यों ? तुम्हारा कोई नहीं है ? “

” थे न ! पर सब मर गए ! “

” कैसे ? ” 

” बस्ती में आग लगी थी। सब झुलसकर मर गए। … तुम्हारा मकान भी आग की लपेट में आया था लेकिन बच गया। ….. “

मुझे समझ नहीं आ रहा था क्या कहू ? मैंने चारो ओर नजर दौड़ाई फिर खिड़की की तरफ देखा। वो नहीं थी।  

” अरे ? ये कहाँ चली गयी ? “

मै दरवाजे से बाहर निकला ,बाहर से दरवाजा बंद किया और वहाँ से निकलने लगा।  सामने एक बड़ा सा बरगद का  पेड़ था और ऐसा लगा की जैसे वहाँ कोई है। शायद कोई पीछे से झांक रहा था। ऐसा लगा जैसे उसके खुले बाल हवा में लहरा रहे है।  

” कौन ? साधना ? ” 

वो पेड़ के पीछे से बाहर आयी।  अभी भी उसकी शकल साफ साफ नहीं दिख रही थी।  

” बाबूजी ? एक बात कहू ? “

” क्या ? “

” आप यहाँ मत रुकिए।  चले जाइये ! “

” क्यों ? ” मुझे हैरानी हुई 

” मेरा घर है ,तुम होती कौन हो मुझे यहाँ से निकालनेवाली ? ” मुझे अब गुस्सा आ रहा था। …

” साब मेरे कहने का मतलब वो नहीं था ! ताऊ आपको जीने नहीं देगा ! वो सब की जान के पीछे पड़ा है। “

” अजीब हो यार तुम ? सामने क्यों नहीं आती ! और ऐसी पहेलियाँ क्यों बुझा रही हो ? और ये ताऊ कौन है ? “

” साब ,यहाँ का साहूकार है ! “

| ” तो ? ” 

” वो बहोत जालिम है।  इंसानो को कीड़े मकोड़ो की तरह मारता है ! हमारी बस्ती उसी ने जलाई ! “

” क्या पुरानी फिल्मो की कहानी सुना रही हो ? आज के ज़माने में ऐसा कही होता है क्या ? 

” साब शहरो में नहीं होता होगा।  लेकिन ये गांव है ! जैसे आप के बाप दादा यहाँ रहते थे ,वैसे उसके भी रहते थे ! आप के दादा तो निकल गए यहाँ से ! लेकिन ये पूरा खानदान साहुकारी करता है !आधे से ज्यादा गांव वो हड़प चुके है ! ये गांव पचास साल पहले भी वैसा ही था आज भी है और शायद अगले सौ साल भी ऐसा ही रहेगा ! ” 

” तो अब तुम कहाँ  रहती हो ? एक काम करोगी ? मेरे घरकी साफ़ सफाई करनी पड़ेगी , कोई मिलेगा यहाँ ? अगर उतनी मदत कर दो तो। …. “

” आप को यहाँ शायद ही कोई मदद मिल पाए। .. या तो आपको करना पड़ेगा या शहर से कोई आदमी लाना पड़ेगा। “

” क्या तुम मेरी मदद कर सकती हो ?”

” अगर कर पाती तो जरूर करती। “

” साब , वो छोड़ो। . वो साहूकार के आदमी इधर ही आ रहे है ,शायदआप के आने की खबर उन तक पोहोच गयी होगी ! “

” उन्हें कैसे पता की हम यहाँ है ? क्या तुमने बताया ? “

तब तक वो लोग मेरे करीब आ गए। … 

” साब , किससे बाते कर रहे हो ?”

” क्यों भाई ? तुम कौन हो ? ‘”

” आप को ताऊ ने बुलाया है ! “

” क्यों ?”

” अरे भाई खाने पर बुलाया है ! आप के पिताजी ताऊजी के घनिष्ट मित्र थे।  उन्हें पता चला की तुम आये हो तो हमें बुलाने के लिए भेज दिया।  वैसे भी अब सूरज ढल गया है। अंधेरा हो रहा है।  तुम यहाँ नए हो ,यहाँ रहना खतरे खाली नहीं है। … यहाँ बुरी शक्तियों का वास है और तुम्हारे घर पर भी ! “

” क्या बकते हो ? तुम्हे क्या लगा मै डर के भाग जाऊंगा ? तुम जैसो से निपटना मुझे आता है।  “

” कोई बात नहीं भाई ! इतना गुस्सा क्यों कर रहे हो ? हमने तो प्यार से निमंत्रण दिया था।  पर शायद तुम इसके आदि नहीं हो ! कोई बात नहीं , तुम्हारी मर्जी ! रात भर रहो उस वीराने में  ! सब हेकड़ी निकल जाएगी ! ” 

मै कश्मकश में पड़ गया। इनकी बातो से तो ये भले लोग लग रहे थे।  लेकिन साधना  ने कुछ और ही बताया था। मै  उसे ढूंढने लगा। पेड़ के चारो ओर चक्कर लगाए। कोई नहीं था। 

” क्या हुआ ?  किसे ढूंढ रहे हो ? “

” यहाँ एक लड़की थी ! “

” भाई साब ,पागल हो गए हो क्या ? ये जगह बरसो से वीरान पड़ी हुई है। … तुम्हारे घर के डर से यहाँ कोई दिन में भी नहीं आता ,तो इस वक़्त क्या मरने के लिए आएगा ? ” 

” मेरे घर से मतलब ? “

” अरे तुम्हारे घर में कोई वास करता है ! “

” क्या बक रहे हो ? मै तो करीब एक घंटा रुका था ! “

” क्या कोई आवाज नहीं आयी ? किसीकी आहट नहीं सुनी ?”

” नहीं ! बिलकुल नहीं सुनी ! हा ,एक लड़की खिड़की से झांक रही थी ,उसने अपना नाम साधना बताया और तुम्हारे बारे में भी उसी ने मुझे बताया की तुम मुझे ढूंढते हुए आओगे ! अभी भी यही थी ,उसी से बात कर रहा था कि तुम लोग आ धमके ! शायद तुम्हारे खौफ से चली गयी। “

” उसने और क्या बताया ? “

” कह रही थी की ताऊजी ने पूरी बस्ती जला दी ,उसमे उसके माँ बाप झुलस कर मर गए , मेरा भी घर उस आग की चपेट में आया था पर बच गया। .. “

” बच गया या हमने बचाया ? और उसने खुद के बारे में कुछ नहीं बताया ? “

” क्या बताएगी ? नाम तो बताया ,साधना ! और क्या बताती ? “

” ये नहीं बताया की वो भी उस आग में जल गयी थी ?”

” क्या ? क्या बेवकूफ समझ रखा है ? अगर जल गयी थी तो यहाँ वहाँ कैसे घूम रही है ? “

” क्यों की उसकी इच्छाए अधूरी थी ! जवान लड़की थी ! हर किसी के सपने होते है , उसके भी रहे होंगे , इसलिए मरने के बाद भी घूमती रहती है ! वो छोड़ो , अभी आ रहे हो या  अपने उस भूतिया मकान में रात गुजारने वाले हो ?  “

    ” भाई हमारा काम था  पैगाम पोहोचाना ,वो हमने कर दिया ,अब इनकी मर्जी , ए या न आये। . हम तो चलते है , इसके लिए अपनी जान  जोखिम मे क्यों डाले ?

 और एक बात साब अगर गलती से हवेली आ भी गए तो हमसे जो कहा वो ताऊजी को मत बोलना , झुग्गियां जलाने वाली बात ! गरम मिजाज  के इंसान है ! वही काट कर फेक देंगे और उन्हें कोई पूछने वाला भी नहीं ! तुम्हारा तो कोई है भी नहीं ! “

इतना कह कर वो निकल गए हवेली की ओर …

  मै सोच में पड़ गया ……

 रात हो चुकी थी। अँधेरा घना था, मुझे इस गांव की जानकारी भी नहीं थी , यहाँ कोई रुकने का ठिकाना होगा ऐसा नहीं लग रहा था। भलाई इसी में थी की ताऊजी का निमंत्रण स्वीकार किया जाये। … मै चुपचाप उनके पीछे निकल लिया।  शायद उन्हें भी भरोसा था की मै आऊंगा। .. वो कुछ नहीं बोले। .. 

 हवेली ज्यादा दूर नहीं थी।  कुछ ही देर में हम हवेली पोहोच गए।  हवेली शायद काफी बड़ी थी ,लेकिन चारो ओर अँधेरा होने के बावजूद ये लोग दिन के उजाले की तरह सफाई से चल रहे थे। ..मेरे दिमाग में एक अजीब ख्याल आया। 

‘ ये भी जिन्दा है या ? …….’

 मेरे ही विचार से मै घबरा गया ! 

” क्या यहाँ बिजली नहीं है ? जो इतना अँधेरा है ? “

” है न ! लेकिन अंदर ही चलाने का हुक्म है।  क्या तुम्हे डर लग रहा है ? “

” डर तो नहीं , लेकिन अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही है ! घुटन हो रही है ! “

” क्यों ? “

” पता नहीं ! “

” साब एक बात पूछू ?”

” बोलो ?”

” क्या आपको ऐसा नहीं लगता ? की आप ने यहाँ आकर गलती कर दी ? “

” नहीं ! बिलकुल नहीं ! पुरखो का मकान है ,मेरी जायदाद है ,मुझे तो आना ही था ,तो आ गया ! …”

तब तक हवेली के दरवाजे तक पोहोच गए थे। … 

 ये हवेली , ये गांव ,वो लड़की , मेरा पुश्तैनी घर , यहाँ का हर इंसान , हर चीज मेरे लिए पहेली बन चुकी थी ! जो या तो अब सुलझने वाली थी , या जिंदगी और उलझनेवाली थी ! …… 

To Be Continued ….. 

ये कहानी आप को कैसी लगी ? आगे क्या पढ़ना पसंद करेंगे ? जरूर कमेन्ट करे ! 

आपका :- लेखक – योगेश वसंत बोरसे 

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