राज | हिंदी कविता संग्रह | RAJ | HINDI KAVITA SANGRAH | POEMS IN HINDI

                राज – RAAZ 

                     

                        हिंदी कविता

 HINDI POEMS

                                               

 कवि : राज योगेश बोरसे

   इक राज का इकरार करके बेकरार क्यों हो गया मैं, 
अभी अभी तो ये राज सिर्फ पता चला है 
जिसकी की थी तमन्ना वो मेरे सामने खड़ा है 
दुआओ में भी आज सागर मिला है 
क्यों ना करू खुदसे मोहोब्बत मैं 
मेरा दिल भी ये कहता है 
कुछ कुछ हो रहा है क्यों की दिल का राज खोला है 
 
   इक राज का इकरार करके बेकरार क्यों हो गया मैं, 

अभी अभी तो ये राज सिर्फ पता चला है 
दो घड़ी आँखे बंद कर ली है, याद सबकुछ आ गया 
प्यार,त्यौहार सब बाद में पहले अंदर से राज बाहर आ गया 
जिंदगी ने खिलाए थे कुछ चक्कर कुछ ऐसे 
क्या है वो अब समझमे आ रहा था 
दौड़ लगाई उनकी तरफ, लेट गया उनकी गोदी में, और फूटफूट के रोया में उस दिन 
क्या हुआ है आज, कोई भी समझ नहीं पा रहा था 
ना मै – ना वो 

इक राज का इकरार करके बेकरार क्यों हो गया मैं, 

अभी अभी तो ये राज सिर्फ पता चला है 
आज खड़ी है चेहेरे पे एक अलग मुस्कान, जो दबी पड़ी थी बरसो से 
खिल पड़ी हर चीज वो,  खफखफ़ा थी अरसो से 
पूछा खुदसे आज, ये अलग अलग सा क्यों लग रहा है 
अरे हां ! मैंने आज राज जो खोला है 
वो राज था कुछ ऐसा, जो मैंने खोला है 
बेहद अरसो बाद मम्मी – पापा को ‘  I LOVE YOU ‘ जो बोला है ! 

इक राज का इकरार करके बेकरार क्यों हो गया मैं, 

अभी अभी तो ये राज सिर्फ पता चला है !

   

 कवी : राज योगेश बोरसे 

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                             दायरा – Dayra – 

                           हिंदी कविता

hindi kavita

 कवि : राज योगेश बोरसे

जिंदगी में किया हर काम दायरे में रहकर

 हर बार जिया मै दायरे में रहकर

निकल पड़ा मै मंजिल की ओर
जिसके लिए की कोशिशे दायरे में रहकर 
निभाता चला गया उसे जो लिखा था 
मेरे दायरे ने खुद मेरे दायरे रहकर
 फिर मेरे इन कोशिशों, प्रयासों का हिसाब लगाया
भगवान ने भी दायरे में रहकर 
कुछ ना मिला मुझे ,जो ढूंढ रहा था मै, मेरे दायरे में रहकर
 फिर सोचा क्यों ना कर लू कुछ ऐसा,जो हो मेरे दायरे से बढ़कर 
शायद मिल जाए वो,जो कभी सोचा न हो , मैंने दायरे में रहकर
 बस अब करता चला गया वो काम, जो था मेरे दायरे से बढ़कर
हुआ होनहार, होशिआर हर चीज में, जो चाहता था दायरे से बढ़कर
दिया भगवान ने भी मुझे दायरे से बढ़कर
 अब मै खड़ा था उस वक़्त पर जहाँ ये दायरा भी बदलना था !
शायद मै अब से ज्यादा पाने की सोच रहा था !
बदल दिया ये भी दायरा और करने लगा बढ़कर से भी बढ़कर
बना लिया फिरसे एक नया दायरा,
जो मुझे और बढ़कर देने वाला था ,बढ़कर से भी बढ़कर
लग पड़ी थी आग, लड़ गई थी जिद
और बन गई थी आदत मेरी दायरा बदलने की,
खुदसे खुद को बड़ा करने की, अनोखा मुकाम हासिल करने की
 यूँ ही हर रोज दायरे से दायरा बदलता चला गया
करता मै जो काम उसे ही दायरा बनाते चला गया
चाहे जो हो, अच्छा या बुरा , उसे दायरा नाम देकर 
दायरे में शामिल करता चला गया
यूँ आदत सी लग गई , मैं माहिर सा बन गया
यूँ ही दायरे से दायरा बदलने का मेरे लिए खेल सा बन गया 
आगे निकल चुका था मै इस खेल में बहोत,
पा लिया सबकुछ बस !
खुदको ही शायद भूल सा गया
  एक दिन हुआ कुछ ऐसा, की याद आ गई खुद की,
बीते दिनों की
देखा पीछे मुड़के सोचा,
मिल जाएंगे बीते दिन फिरसे …
कोई न था साथमे बस !
खड़ी थी एक नई चुनौती, सामने था एक और मुस्कुराता नया,
एक और बड़ा दायरा  

जो ललकार रहा था मुझे ,क्या मेरे जितना बनोगे ?

या इतना ही है तुम्हारा दायरा …….. ?

 कवी : राज योगेश बोरसे

 

 

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                     -: तू चल सदा :- 

HINDI KAWITA

हिंदी कविता

 

कवी : राज योगेश बोरसे 

 करेगा वक़्त सदा जिक्र तेरा 
ऐसा हो समय पर असर तेरा 
तू चल सदा 
रक्षणार्थ हो तेरे तेरे मन की शांति ढाल बने 
और हो संयमी बाहुबल तेरा 
करेगा वक़्त सदा जिक्र तेरा तू चल सदा 
हो वचन बद्धता पैरोमे, हो चाल में वजन सदा 
और हो पराक्रमी शील तेरा तू चल सदा  
करेगा वक़्त सदा जिक्र तेरा 
तू चल सदा 
हो विशाल मन सदा ह्रदय में हो विनम्रता 
और हो खुद की नजर पर काबू तेरा तू चल सदा 
करेगा वक़्त सदा जिक्र तेरा 
हो धर्म कण कण में दिल में हो विश्व बंधुता 
और हो कुशाग्र बुद्धि ऐसी जिस पर हो नियंत्रण तेरा तू चल सदा 
करेगा वक़्त सदा जिक्र तेरा 
हो बड़ा लक्ष ऐसा जिस पर झुकी पड़ी हो विश्वता 
और हो लक्ष से बढ़कर सामर्थ्य तेरा तू चल सदा
करेगा वक़्त सदा जिक्र तेरा तू चल सदा……  

कवी : राज योगेश बोरसे

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                    ये क्या बना दिया ?

HINDI KAVITA

हिंदी कविता

  -: ये क्या बना  दिया ? :- 

किसी की तरफ देखकर मुस्कुरा दिया

 तो हमें खुश मिजाज कह दिया ? 

किसी के गम में शरीक हो गए तो रिश्तेदार बना दिया ? 

किसी के गिरने पर हमें हसी आई तो आवारा कह दिया ? 

किसी पर तरस खाकर उसे थोड़ी मदद कर दी 

तो हमें खुदा बना दिया ? 

किसी की गलती के कारन उस पर हाथ उठा दिया 

तो हमें गुंडा बना दिया ? 

दो चार गाने ढंग से गए लिए तो 

हमें सिंगर बना दिया ? 

 किसी की जुदाई  में थोड़े आंसू  बहाये तो 

हमें आशिक बना दिया ?

थोड़ी तरक्की कर ली तो

 हमें घमंडी बना दिया ? 

किसी की बुराई करने से अगर हम बुरे बन जाते है 

 तो किसी के बारे में अच्छा बोलने पर चापलूस  बना दिया ?

हे भगवन ,तूने मुझे इंसान बनाया था ! लेकिन मै  ये क्या बन गया ? 

कवी :- श्री. योगेश वसंत बोरसे

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