लॉक डाउन | Lock Down | हिंदी कविता संग्रह | Hindi Kawita Sangrah | poem

                        Lockdown – 

 हिंदी कविता

 HINDI POEMS

 

कवि :- श्री राज योगेश बोरसे                                                  

  रोये के हसे समझ नहीं आ रहा ,

छुट्टिया ही चाहते थे जिंदगी में ,
LOCKDOWN के रूप में मिली है ,
फिर भी मजा नहीं आ रहा ,
   बेचैन से हो गए है ,सामने वाले मंजर से ,
वक़्त तो बहोत है ,लेकिन कितना ? ये समझ नहीं आ रहा ,
जी रहे है ऐसे तैसे ,भूखे प्यासे कई लोग कही पर ,
उनकी ये हालत देख हमें भी जीना नहीं आ रहा ,
लॉक डाउन तो है ,लेकिन मजा नहीं आ रहा ,
  खेल कूद करे ,या कुछ काम ,ये समझ नहीं आ रहा ,
जीना तो सबको है लेकिन इस जीने में मजा नहीं आ रहा ,
जीने और मरने की स्थिति से गुजर रहे है ,
उम्मीदे है की सब ठीक हो जायेगा ,
   एक दिन आएगा ऐसा की इंसान इस काल चक्र से बाहर निकल जायेगा ,
 उम्मीदे तो है बहोत सारी लेकिन उनमे विश्वास नहीं भा रहा,
 विश्वास तो खुद बीमार है इस महामारी से ,उससे भी उठा नहीं जा रहा ,
कहते है चुनौतीया एडवेंचर होती है ,लेकिन ऐसे एडवेंचर है सजा  ,
इसमें बिलकुल मजा नहीं आ रहा ,किस कदर ठहरा है ये वक़्त ,ये समझ नहीं आ रहा ,
   ढूंढ रहे है भगवान् को लेकिन भगवान् सामने नहीं आ रहा ,
खोई है खुशिया ,खुशिया ढूंढने का भी मजा नहीं आ रहा ,
LOCKDOWN तो है ,मगर लॉक डाउन में मजा नहीं आ रहा !  
कितने सपने रूठ रहे है ,
अपने ही लोगो को मरता देख अंदर से टूट रहे है | 


                              

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                          -: कहर कोरोना का :-

 हिंदी कविता

कवी :- श्री.योगेश बोरसे

 हाय रे कोरोना ये क्या कर दिया ,

अच्छे खासे इंसान को मरीज बना दिया ?

अभी अभी तो हम इंसान बने थे 

तूने फिर से हमें बंदर बना दिया ? 

चेहरे पर चेहरा लगा रहे थे लोग

तूने मास्क लगाने को मजबूर कर दिया ?

 इंसान को इंसान से दूर कर दिया 

संदेह का जहर फैला दिया ?

शहरो ने गांव को बड़ा किया 

और शहरों को गावों से जुदा कर दिया ? 

रिश्ते नाते तो ऐसे भी बिखर चुके थे

तूने और दूर कर दिया ?

अभी अभी तो  हम गले मिलने लगे थे 

अभी दूर से हाथ जोड़ने पर मजबूर कर दिया ? 

बिखर गयी कई जिन्दगिया तेरे खौफ से 

तूने झट से उन्हें उठा लिया ? 

क्या पाया तूने इतनी जिन्दगिया बर्बाद कर के ? 

की भगवान भी तुझसे डर के मंदिर में छुप गया ?

   अभी ये दुरी न जाने कब मिटेगी ?

या दुनिया के अंत तक बढ़ती ही जाएगी ?

 जिंदगी वीरान हो गयी , मौत से बद्तर हो गयी !

जो थोड़ी बहोत आस थी जीने की वो भी टूट गयी ! 

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