-: निमंत्रण मौत का :-
Hindi Horror Stories collection
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१} पालकी { गजर } २ } रात के १२ बजे 3 } दुल्हन की हलदी ४ } प्यास ५ } कावेरी
६} निमंत्रण ७] आत्मा की पुकार ८ } एक शादी ऐसी भी ९} मौत की खामोशी १० } माँ का साया
Sample Story :-

“ ज्ञानेश्वर माऊली , ज्ञानराज माऊली तुकाराम ….. बोला ….. पुंडलिक वरदे ……… “
जयघोष करते हुए पालकी आगे बढ़ती जा रही थी। सभी लोग झांझ और मृदंग की ताल में तल्लीन थे। पालकी तेज़ी से आगे बढ़ रही थी। जिनमें शक्ति थी वे तेज़ी से आगे बढ़ रहे थे, और कुछ भयंकर थकावट के कारण पीछे रह रहे थे।…..
….. दोपहर ढलकर शाम हो गई थी, और जल्द से जल्द मुकाम ( पड़ाव ) पर पहुँचना ज़रूरी था। घाट पार करते ही घाट के तल पर एक छोटा सा गाँव था।
उस गाँव में पालकी का मुकाम था। लेकिन घाट काफी बड़ा था। पहाड़ों और घाटियों से घिरा हुआ। घने पेड़, झाड़ियाँ।
जंगली जानवरों के कारण रात में घाट का इस्तेमाल ज़्यादा नहीं होता था। इसलिए, कई वारकरियों का मत था कि पिछले पड़ाव पर ही रुक जाना चाहिए।
लेकिन सूरज तब सर पर था ,दोपहर थी और कुछ उत्साही वारकरियों का मत था कि हम कुछ ही समय में घाट पार करके अगले मुकाम पर आसानी से पहुँच जाएँगे।
इसलिए, उन्होंने सबका मत लिए बिना, किसी से पूछा नही और उत्साह में निकल पड़े। कुछ लोगो की इच्छा नहीं थी, लेकिन वे विरोध नहीं कर सके।
घर से निकलते समय कई लोग उत्साह से निकले थे, लेकिन अब शारीरिक क्षमता उजागर हो गई थी। पैरों में ऐंठन आने लगी।
तो उत्साह कम होने लगा। लेकिन यह देवकार्य (ईश्वर का कार्य ) होने के कारण, इसमें शामिल होने के बाद ना कैसे कहें? वे जैसे-तैसे, घिसटते हुए, मजबूरन चल रहे थे।
ऐसा करते-करते सब बिछड़ गए। एक-दूसरे से दूर होते गए। कुछ गिने-चुने वारकरी पालकी के साथ जा रहे थे। उन्हें मुकाम पर पहुँचना था। वे नाम जप में इतने तल्लीन थे कि किसी ने यह भी ध्यान नहीं दिया कि उनके साथ कौन है और कौन नहीं।
जैसे ही सूरज डूबने लगा, घाट में अंधेरा बढ़ने लगा। जानकारों के अनुसार दो घंटे लगातार चलने पर घाट खत्म होता। यह सुनकर कुछ लोग हताश हो गए, निराश हो गए। कुछ लोगो ने तो सचमुच घुटने टेक दिए।
किसी ने यह सोचकर पीछे रुकना चाहा कि अगर कोई गाड़ी आई, तो भगवान से माफ़ी मांगेंगे, नाक रगड़ेंगे और गाड़ी से चले जाएँगे।
पर कोई गाड़ी आणि तो चाहिये ! रुकनी भी तो चाहिये !…..
देखते-देखते फासला बढ़ता गया। कुछ लोग अकेले पड़ने की कगार पर आ गए। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आगे बढ़ें या पीछे वालों के लिए रुकें।
ऐसा ही एक आदमी, सखोबा, अकेला पड़ गया।
मूलतः डरपोक स्वभाव का था। कभी अकेले घूमना या किसी से घुलना – मिलना नहीं आता था। शांत, अकेला रहने वाला। उसकी माँ, रखमाबाई, उसे बहुत प्यार करती थी।
उसने अपने बेटे को चार लोगों के बीच घुलने-मिलने और हिम्मत बढ़ाने के लिए ज़बरदस्ती वारी (तीर्थयात्रा) पर भेजा था।
सखोबा भी अपनी माँ से बहुत प्यार करता था। वह भी उनका मन नहीं तोड़ना चाहता था, इसलिए वह भी निकल पड़ा।
ख़ैर, यहाँ किसी से बात करने का सवाल ही नहीं था। भगवान का नाम जपते हुए आगे बढ़ना था। जहाँ मुकाम होगा, वहाँ दो कौर{ निवाले } पेट में डालना था और फिर आगे बढ़ना था। दो दिन तक कुछ महसूस नहीं हुआ।
लेकीन अब …… ?
तैंतीस करोड़ देवी-देवता हैं हमारे। एक- एक का नाम याद करने लगें तो ज़िन्दगी खत्म हो जाएगी !
लेकिन पीढ़ियों के संस्कारों से कहें, आनुवंशिकता से कहें या खून में ही समाया हुआ कहें। जब इंसान डरता है, तो ज़ुबान पर आमतौर पर एक ही नाम आता है।….
सखोबा अनजाने में राम राम राम राम…का जाप करने लगा।
डर के मारे पेट में गोला उठ रहा था। क्या करे , समझ नहीं आ रहा था। शरीर, मन, बुद्धि बहुत थक चुके थे। लेकिन यहाँ रुकना ?…
नहीं, बिल्कुल नहीं !
घाट घुमावदार था। एक तरफ ऊँचा पहाड़, एक तरफ गहरी खाई। लेकिन दोनों घने जंगल से भरे हुए। एक मोड़ पर आकर सखोबा रुक गया। उसने आगे-पीछे नज़र दौड़ाई, कुछ भी दिखाई नहीं दिया।
एक परिंदा भी नहीं।
मतलब इस भयानक माहौल में वह अकेला है। अब क्या करें?
उसने आस-पास देखा। एक तरफ बैठने की थोड़ी सी जगह दिखाई दी, तो सखोबा सोचने लगा, थोड़ी देर बैठूं, पीछे के लोग आएँगे तो आगे जाऊँगा।
वह अपने ही विचारों से चौंक गया। पीछे के लोग ?
क्या कोई पीछे रुका है ?
या मैं ही पीछे रह गया हूँ ?
और वह डर से कांपने लगा।…..
….फिर से राम… राम का जाप शुरू हो गया। रात काफी हो गई थी। उसे अपने मोबाइल की याद आई। उसने कांपते हाथों से जेब से मोबाइल निकाला। समय देखा, साढ़े आठ ?
मतलब अभी ज़्यादा रात नहीं हुई है। लेकिन फिर भी साढ़े आठ ?
किसी ने थोड़ी देर पहले कहा था कि एक-दो घंटे लगातार चलने पर घाट खत्म होता है, लेकिन ऐसा तो कुछ लग नहीं रहा।
इसका मतलब या तो वह झूठ बोल रहा था, या उसे पता नहीं होगा, या लोगों को दिलासा देने के लिए बोला होगा।
…. काफी देर हो गई ….
इतने समय में एक भी गाड़ी नहीं आई। वह पेड़ के पास खड़ा हो गया, कभी टहनी पकड़कर दोनों तरफ झुककर देखता कि कोई गाड़ी आ रही है क्या?
तभी ….
बस जैसी कोई चीज़ आती हुई दिखाई दी, इसे खुशी हुई !
सखोबा वैसे ही सुध-बुध खोकर नाम स्मरण करने लगा और टहनी पकड़कर झूमने लगा।
बस करीब आने लगी, तो वह हाथ के इशारे करने लगा। उसके अजीबोगरीब इशारे देखकर बस में बैठी एक महिला ज़ोर से चिल्लाई !
और उसकी ओर हाथ के इशारे करके, उंगली दिखाते हुए भूत… भूत कहकर चिल्लाने लगी !…..
ड्राइवर ने ज़ोर से ब्रेक मारा। तभी बाकी यात्रियों ने विरोध किया। रुकना नहीं चाहिए !
इस घाट में अमानवीय शक्तियों का वास है, यह आज प्रत्यक्ष अनुभव किया !
चलो, बस आगे बढ़ाओ !….
ड्राइवर मजबूर हो गया और उसे गुस्सा भी आया। अगर इस मूर्ख को आना था, तो बाईं तरफ खड़ा होता, हाथ देता, गाड़ी रुक जाती ! लेकिन नहीं। अब मर साले ऐसे ही !
और बस भर्रर्र करके निकल गई। सखोबा बस के पीछे दौड़ने लगा। किसी ने उसे देखा। बस में हंगामा मच गया।
इधर सखोबा हाँफकर रुक गया और बस आगे जाकर रुक गई, लेकिन सखोबा को यह समझ नहीं आया। वह फिर से उस पेड़ की तरफ गया। वहीं रुककर दूसरी गाड़ी का इंतज़ार करने लगा।…..
इधर बस में बैठे कुछ बहादुर लोग नीचे उतर आए। दो-तीन लोग उतरे थे। चारों तरफ उसे खोजने लगे। लेकिन वह दिखे तो कसम…
पर एक आदमी को वह नजर आ ही गया। और वह उल्टे पैर बस की तरफ भागा। क्या हुआ ?
यह दोनों को समझ नहीं आया, लेकिन बस छूट गई तो घाट में पैदल चलना पड़ेगा, इसलिए वे भी भागने लगे।…
… इन तीनों को भागते देखकर बस में बैठे लोगों को कुछ अलग लगा। उनकी हरकतों से ड्राइवर परेशान हो गया।
उसने बस चालू कर दी। बस की आवाज़ सुनकर वे तीनों जान लगाकर भागे और हाँफते हुए बस में चढ़ गए। कंडक्टर ने धड़ाम से दरवाज़ा बंद किया और घंटी बजाई।
तब यात्री उनसे पूछने लगे। दो लोगों के पास बताने के लिए कुछ नहीं था, लेकिन जो भागा था, उससे सब पूछने लगे,
” क्या हुआ, क्या हुआ ? “
तब उसे अपना महत्व बढ़ा हुआ महसूस हुआ और उसने जो देखा था, उसे मिर्च- मसाला लगाकर, खूब बढ़ा – चढ़ाकर बताने लगा।
उसने जो वर्णन किया, वह इस प्रकार था :–
” अरे, क्या बताऊँ आपको। हमें लगा बेचारा घाट में अकेला रह गया होगा , इसलिए बस रोकी। हमने सोचा यह आएगा ,पर नहीं। उसकी हद उस पेड़ के पास ही थी। थोड़ा दौड़ते-दौड़ते आया और हद खत्म होते ही गायब हो गया।
हमने ढूंढा, पर दिखा नहीं। और अचानक मेरा ध्यान गया, तो वह उस टहनी से उल्टा लटका हुआ था। और हंस रहा था, मुझे इशारा कर रहा था।
लेकिन मुझे ऐसे कई अनुभव हुए हैं, इसलिए मैं उसकी परवाह न करते हुए बस की ओर भागा। क्योंकि उसकी हद से निकलना ज़रूरी था।”
एक ने पूछ ही लिया,
” अरे, दिखने में कैसा था ?”
प्रश्न इतना अजीब था कि इसे बोलते नहीं बन रहा था।
” कैसा मतलब ? “
” अरे, दिखने में कैसा था ? “
उन तीनों ने, जो भी देखा था,समझा था , उन्होंने बताना शुरू कर दिया। तभी इसने घंटी बजाई,
” अरे, वह हमारा सखोबा है। हमारे साथ वारी पर आया था। पहली बार आया था। गलती से बिछड़ गया और फासला बढ़ता गया।
वह आगे निकल गया और मैं पीछे रह गया। रुकिए, उसे साथ ले लेते हैं, नहीं तो बेचारा सचमुच भूत बन जाएगा ! “…..
फिर से बस में हंगामा मच गया।…..
कुछ ही पलों में बस रुक गई और वह व्यक्ति नीचे उतरा। उल्टे पैर तेज़ी से जाने लगा। उसके उतरते ही बस में बैठे यात्री ड्राइवर को दोष देने लगे ,चील्लाने लगे की निकलो यहा से ! एक आदमी के लिये इतने लोगो की जान को खतरे मे नही डाल सकते …..
वह कुछ दूर आगे गया, तो बस के चलने की खरखर की आवाज़ आई। उसने मुड़कर देखा, पर बस निकल चुकी थी।
इधर सखोबा डरते – डरते थक चुका था। अब उसे ग्लानि (बेहोशी/सुस्ती) आ गई थी। तभी उसे कुछ दूरी से किसी के पुकारने की आवाज़ सुनाई दी।
और कुछ दूरी पर एक आकृति अपनी ओर सरकती हुई दिखाई दी। और सखोबा का धैर्य टूट गया। वह विपरीत दिशा में भागने लगा। सखोबा को भागते देखकर वह व्यक्ति आवाज़ देते हुए सखोबा के पीछे आने लगा।
तब सखोबा जान लगाकर भागने लगा।
और ….
अगले मोड़ से एक ट्रक आया। ट्रक और सखोबा इतने अप्रत्याशित रूप से सामने आए थे कि सखोबा खुद को बचा नहीं सका।
और ड्राइवर ?
उसके दिमाग में तो पक्का फिट था कि ऐसा कोई सामने आए तो रुकना नहीं है।
वह रुका नहीं, उलटा स्पीड बढ़ा दी। और ड्राइवर का विश्वास बढ़ गया कि उसके अनुभव कितने सच हैं !…
…क्योंकि अभी – अभी सामने से आकर एक आदमी गाड़ी से टकराया था, फिर भी सामने से दौड़ते हुए दिखाई दे रहा था।
हाथ के इशारे करते हुए गाड़ी रोकने की कोशिश कर रहा था। लेकिन ड्राइवर अब अलर्ट था। वह रुकने वाला नहीं था।
और वह ट्रक आगे निकल गया, एक और व्यक्ति को कुचलता हुआ !….
…. एक गलतफ़हमी को पुख्ता करता हुआ और लोगों को बताने के लिए एक गलत अनुभव अपने साथ बांधता हुआ, कि इस घाट में भूतों और पिशाचों का वास है, जो गाड़ियों को हाथ देते हैं, और अगर न रुको तो गाड़ी से टकराकर गायब हो जाते हैं……
लोगों की मूर्खता और डर के कारण दो जानें व्यर्थ चली गईं…
अगले दिन मिले शवों की हालत ने इस बात पर मुहर ही लगा दी कि कुछ अमानवीय शक्तियाँ यहाँ जाग्रत हैं, और रात में यहाँ जाना यानी मौत को न्यौता देना है ! …..
…..सखोबा की माँ आज भी सखोबा का इंतज़ार कर रही है। और सखोबा इस भ्रम में कि वह असल में किससे मरा, इधर जाऊँ कि उधर जाऊँ, घूमता रहता है।
और जो यात्री घाट से गुज़रते हैं, वे कुछ दिखे न दिखे, अखबारों में पढ़ी खबरों के कारण ये बातें कितनी सच हैं, कितनी झूठ, इस पर एक-दूसरे का दिमाग खाते रहते हैं।
और जो वारकरी पालकी के साथ आगे गए थे, वे अपनी पुण्याई (शुभ कर्मों) से बचने का सोचकर और ज़ोर-ज़ोर से भगवान का जयघोष करते हैं…
NOTE :- (हम जीवन में कुछ चीज़ों को मानकर चलते हैं, जिसके कारण कभी-कभी किसी की जान खतरे में पड़ जाती है, फिर भी हमारे ऊपर मान्यताओं का ऐसा कब्ज़ा है कि हम यह बताने में ही जीवन गुज़ार देते हैं कि हम ही कैसे सही हैं।
ये कितना अच्छा और कितना बुरा है, ये हर किसी को खुद तय करना चाहिए।
लेकिन अगर ऐसा ही चलता रहा, तो ये मान्यताएँ बदलेंगी कब और बदलेगा कौन ?
इस काल्पनिक कहानी के माध्यम से इस पर प्रकाश डालने का यह एक छोटा सा प्रयास किया गया है।)
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