-: दास्ताँ एक तक़दीर की :-


लेखक :- योगेश वसंत बोरसे
” मुझे पैसे चाहिए। .. “
” क्यों ?”
” कुछ खरीदारी करनी है। “
” बाद में कर लेना। “
” नहीं अभी जाना है। .. “
” कितने पैसे चाहिए ? “
” तुम्हारे पास कितने है ? “
” मतलब ?”
” अरे तुम कितने दे रहे हो ? “
” अरे तुम्हे कितने चाहिए वो बताओ न… “
” मुझे तो करोडो चाहिए , औकात है तुम्हारी .. ? “
” क्या कहा तुमने ? “
” कुछ नहीं। .. “
” तुमने मेरी औकात निकाली ? तुम्हारी औकात क्या है ? दो कौड़ी कमाने की अकल नहीं ,दिन भर सोफे पर पड़ी रहती हो ,टीवी देखती रहती हो। तुम्हारे बाप ने भी कभी करोडो देखे है ? “
” मै मेरे पापा की लाड़ली थी , आज अगर पापा होते तो मेरी शादी तुमसे नहीं , किसी अच्छे घर में होती। .. “
” तो अपने पापा को संभाला क्यों नहीं ? क्यों उन्हें मौत के मुँह में झोक दिया ? उनकी जगह अगर तुम मरती तो मै तो छूट जाता। … और मै तुम्हारे घर नहीं आया था ,तुम्हारे रिश्तेदार आये थे रिश्ता लेकर। … और तुम्हारी माँ और मौसेरा भाई भी तो आया था मुझे देखने। .. उन्हें क्यों नहो कोसती .. ? “
” न जाने तुमने मेरी माँ पर क्या जादू कर दिया ,उसने तुम्हे जबरदस्ती मेरे गले में डाल दिया। … “
” कुछ समझ में आ रहा है क्या बोल रही हो ? कभी अपनी बाते सुन भी लिया करो। … “
” क्या करू सुनकर ? जिंदगी बर्बाद हो गयी मेरी। दो पैसे क्या मांग लिए। तमाशा खड़ा कर दिया। “
” अरे मांगने का कोई तरीका होता है , तुम तो जैसे वसूली करती हो ,गुंडों की तरह .. अगर ठीक से बताती तो मै नहीं देता क्या ..? “
” रहने दो तुम्हारे पैसे तुम्हारे पास , तुम्हारे बच्चो के काम आएंगे। .. “
” मेरे बच्चे ? क्या वो मेरे अकेले के बच्चे है ? तुम्हारी कोई जिम्मेदारी नहीं बनती उनके प्रति … ? “
” मुझे किसी की जिम्मेदारी नहीं लेनी , मेरी आगे की जिंदगी मुझे अपनी मर्जी से जीनी है । .. “
” और बच्चो का क्या ?”
” वो बड़े हो गए अब। उनका वो देख लेंगे ! मैंने क्या उनका ठेका लेके रखा है ?”
” कैसी माँ हो तुम ? न मेरे बारे में सोचती हो ,न बच्चो के बारे में ? तुम्हारी माँ तो ऐसी नहीं है ,सबका कितना ख्याल रखती है ! “
” तो उसके घर पर जाकर रहो न। “
” मै क्यों जाऊ ? “
” तो मुझे क्यों बता रहे हो ? उसके पास मेरे पापा के पैसे पड़े है ,जो उनके मरने के बाद उसे मिले थे ,वही बैठकर अब तक खा रही है। . “
” अपनी माँ के बारे में ऐसे बोलते हुए तुम्हे शर्म नहीं आती ? … “
” जो सच्चाई है वो है काश उसकी जगह मै होती। .. “
” मतलब ? मतलब क्या है तुम्हारा ? तुम मेरे मरने का इंतजार कर रही हो ? “
” अरे मेरे इतने नसीब कहा ? और तुम मर भी जाओगे तो क्या होगा ? क्या पीछे छोड़ के जा रहे हो ? तुम्हारे पास तो कुछ भी नहीं ! “
” अरे जब से शादी हुई है , आज पच्चीस साल हो गए है ,एक पैसा कमाने की अकल नहीं ,बस खर्च करना आता है ! अगर बचाती तो तुम्हारे ही काम आता। .. “
” अरे तुमने कभी ज्यादा पैसे दिए है जो मै बचा लुंगी। .. छोड़ो जाने दो। मै जा रही हूँ … “
” कहाँ जा रही हो ? “
” तुमसे मतलब ?”
” मुझसे कोई मतलब नहीं ? “
” खाली रोब झाड़ते हो , बाकि आता क्या है तुम्हे .. ? “
” ठीक है जाओ … दुबारा शकल मत दिखाना … “
” क्यों ? कोई दूसरी देख रखी है ? एक सँभालने की औकात नहीं ,दूसरी करने चले। .. “
” ईशा। .. “
अमित ने एक जोरदार थप्पड़ उसके मुँह पर जड़ दिया। ईशा सन्न हो गयी। फिर भी संभलकर बोली ,
” ये गलती दोबारा मत करना ,वरना पछताने के लिए भी जिन्दा नहीं रहोगे ! “
” धमकी दे रही हो ? “
” नहीं अगर आजमाना चाहते हो तो एक बार और हाथ उठाओ ,फिर देखो मै क्या करती हूँ। .. “
” क्या करोगी ? ..”
” मारो न …. क्यों फट गयी ? बस यही औकात है तुम्हारी ! तुमसे कुछ नहीं होता .. बस बाते बड़ी बड़ी करते हो। .. घबराओ नहीं ,मै तुम्हे इतनी आसानी से छोडूंगी नहीं ! तुम्हारा जीना हराम न किया तो मेरा नाम ईशा नहीं ! मुझे पैसे दो … “
” मेरे पास नहीं है। .. “
” क्रेडिट कार्ड दो। .. “
” नहीं। … वो इमेर्जेन्सी के लिए है ! “
” तो इमेर्जेन्सी आ गयी समझो। .. “
” ईशा ,अपने आप पर कंट्रोल करना सीखो। .. इतनी जिद अच्छी नहीं ! “
” जिद है तो है ! यही अपुन का स्टाइल है ! लाओ कार्ड दो इधर। … ” अमित ने मजबूरी वश कार्ड दे दिया। ..
” THATS LIKE A GOOD BOY ! ”
ईशा लहराती हुई निकल गयी और अमित सर पकड़कर बैठ गया।
वो तंग आ चूका था ईशा से , दो बच्चे थे उसके ,दोनों भी उसकी तरह शरीफ थे , ईशा की तरह अड़ियल नहीं थे ! उन्हें अमित से गहरा लगाव था। ईशा उनकी तरफ ध्यान ही नहीं देती थी ,जब से होश सम्भला था उन्होंने ,अपने बाप को ही सब कुछ करते पाया था।
… उन्हें भी ईशा अच्छी नहीं लगती थी , पर क्या करे वो भी सहने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे !
देखते देखते बड़ा लड़का पच्चीस का हो चूका था। … उसकी शादी की उम्र थी ! छोटा लगभग बिस का। लेकिन उनके लिए कुछ लिया तो ईशा को सहन नहीं होता था , मेरे लिए पैसे नहीं और इनके लिए कहा से आते है ! वो ये तक नहीं सोचती थी कि ये उसके खुद के बच्चे है !
वो स्वार्थ के दलदल में निचे तक धस चुकी थी। उसका डूबना निश्चित था !
‘ इसका इंतजाम करना पड़ेगा … ‘
अमित गहरी सोच में डूब गया। .. इसका इंतजाम करना पड़ेगा। …. लेकिन … कैसे ….?…..
To Be Continued …….




